झोलाछाप बनारसी

जनवरी 2, 2009

जनपद का कवि

Filed under: त्रिलोचन शास्त्री,हिन्दी कविताये — themaskedcrusader @ 8:39 पूर्वाह्न

उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है, नंगा है,
अनजान है, कला–नहीं जानता कैसी होती है क्या है,
वह नहीं मानता कविता कुछ भी दे सकती है।
कब सूखा है उसके जीवन का सोता,
इतिहास ही बता सकता है।
वह उदासीन बिलकुल अपने से, अपने समाज से है;
दुनिया को सपने से अलग नहीं मानता,
उसे कुछ भी नहीं पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची,
अब समाज में वे विचार रह गए नही हैं
जिन को ढोता चला जा रहा है वह,
अपने आँसू बोता विफल मनोरथ होने पर
अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण सुन पढ़ कर,
जपता है नारायण नारायण।

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‘त्रिलोचन शास्त्री’

कोइलिया न बोली

Filed under: त्रिलोचन शास्त्री,हिन्दी कविताये — themaskedcrusader @ 8:37 पूर्वाह्न

मंजर गए आम
कोइलिया न बोली

बूटों के अपने
हाथ उठाए
धरती
वसंती-सखी को बुलाए
पड़े हैं सब काम
कोइलिया न बोली

मंजर गए आम
कोइलिया न बोली

पाकर नीम ने
पात गिराए
बात अपत की
हवा फैलाए
कहाँ गए श्याम
कोइलिया न बोली।

मंजर गए आम
कोइलिया न बोली

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‘त्रिलोचन शास्त्री’

बिस्तरा है न चारपाई है

Filed under: त्रिलोचन शास्त्री,हिन्दी कविताये — themaskedcrusader @ 8:35 पूर्वाह्न

बिस्तरा है न चारपाई है,
ज़िंदगी खूब हमने पाई है।

कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम मत लो हमारा भाई है।

ठोकरें दर-ब-दर की थी हम थे,
कम नहीं हमने मुँह की खाई है।

कब तलक तीर वे नहीं छूते,
अब इसी बात पर लड़ाई है।

आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सचाई है।

कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह सँभल के आई है।

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‘त्रिलोचन शास्त्री’

भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा

Filed under: त्रिलोचन शास्त्री,हिन्दी कविताये — themaskedcrusader @ 7:50 पूर्वाह्न

भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी नहीं,
झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं सँभाल सका अपने को।
जाकर पूछा ‘भिक्षा से क्या मिलता है। ‘जीवन।’
‘क्या इसको अच्छा आप समझते हैं।’
‘दुनिया में जिसको अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं,
छूछा पेट काम तो नहीं करेगा।’
‘मुझे आप से ऎसी आशा न थी।’
‘आप ही कहें, क्या करूँ, खाली पेट भरूँ,
कुछ काम करूँ कि चुप मरूँ, क्या अच्छा है।’
जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था।

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‘त्रिलोचन शास्त्री’

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

Filed under: त्रिलोचन शास्त्री,हिन्दी कविताये — themaskedcrusader @ 7:38 पूर्वाह्न

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं.

चंपा सुंदर की लड़की है
सुंदर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चंपा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

चंपा अच्छी है
चंचल है
नटखट भी है
कभी-कभी ऊधम करेती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूँढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ – अब काग़ज़ गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

चंपा कहती है:
तुम काग़ज़ ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चंपा चुप हो जाती है

उस दिन चंपा आई, मैंने कहा कि
चंपा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है -
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चंपा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढूँगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढूँगी

मैंने कहा चंपा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे संदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चंपा पढ़ लेना अच्छा है!

चंपा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,
हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करूँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी
कलकत्ता में कभी न जाने दूँगी
कलकत्ता पर बजर गिरे।

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‘त्रिलोचन शास्त्री’

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